बीमार (Bimar)- Hindi moral stories: बेस्ट मोटिवेशनल स्टोरी इन हिंदी (eagle story) for kids in hindi:
बेस्ट मोटिवेशनल स्टोरी इन हिंदी– शारीरिक रूप से अस्वस्थ जीव को, बीमार (Bimar) कहा जाता है| बीमारी एक अभिश्राप है| जिसका दुष्प्रभाव बीमार व्यक्ति पर, नकारात्मक रूप से पड़ता है| ऐसी ही एक कहानी, एक किसान के लड़के की है| जिसका नाम दुष्यंत था| उसने बचपन से ही, अपने पिता को खेती में, जूझता हुआ पाया था इसलिए, उसका सपना था कि, वह कृषि विभाग में अधिकारी बने और किसानों के जीवन में, सकारात्मक परिवर्तन लाए| दुष्यंत पढ़ाई में बहुत होशियार था| पढ़ाई ख़त्म होते ही, दुष्यंत ने कृषि विभाग से संबंधित, नौकरियों में आवेदन देना शुरू कर दिया और परिणामस्वरूप, कुछ ही महीनों में, दुष्यंत को उसकी इच्छा अनुसार, उसी के ग्रामीण क्षेत्र के अंतर्गत, कृषि अधिकारी के पद पर, नियुक्त मिल गई| नौकरी मिलने से दुष्यंत बहुत ख़ुश था| उसे ऐसा लग रहा था कि, उसके जीवन की सभी इच्छाएँ पूरी हो गई| अब वह अपनी सेवाएँ, किसानों के हित में देना चाहता था और उसी सिलसिले में, वह कई गांवों का दौरा करने लगा| अलग अलग जगह जाकर, वह किसानों को अच्छे क़िस्म की फ़सलें बोने के लिए, प्रेरित करता और खेतों में, कम से कम कीटनाशक का इस्तेमाल करने को कहता| किसान भी दुष्यंत की बात से प्रेरित होने लगे थे| कुछ महीने गुज़रते ही, दुष्यंत की मेहनत ने असर दिखाना शुरू कर दिया| खेतों में फ़सलें लहलहाने लगी| दुष्यंत किसानों की लहलहाती फ़सल देखकर, बहुत ख़ुश रहने लगा| उसे ऐसा लगने लगा कि, उसने अपनी पढ़ाई का सही इस्तेमाल किया है जिससे, वह किसानों के जीवन को सकारात्मक रूप से, बदलने का माध्यम बन रहा है| एक दिन दुष्यंत, एक खेत में भ्रमण कर रहा था| उसी वक़्त अचानक, उसे खून की उल्टियां होने लगती है| खून देखकर वह घबरा जाता है| वह तुरंत डॉक्टर के पास पहुँचता है| डॉक्टर, दुष्यंत के शरीर का परीक्षण करके बताते हैं कि, उसे कैंसर है| कैंसर का कारण पूछने पर, उसे पता चलता है कि, कई बरसों से हानिकारक कीटनाशक के इस्तेमाल से, उत्पादित अनाज को खाने के कारण ही, उसे कैंसर हुआ है| बीमारी के बारे में पता चलते ही, दुष्यंत की दुनिया उजड़ जाती है| उसका मनोबल बुरी तरह टूट चुका था| उसके सपने बिखर गए थे|

डॉक्टर्स ने उसके शारीरिक परीक्षण के बाद बताया कि, “वह कुछ ही सालों तक ज़िंदा रहेगा” क्योंकि, कैंसर पूरे शरीर में फैलता जा रहा है| डॉक्टर्स ने अपनी बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि, “तुम्हें अपनी नौकरी छोड़ देना चाहिए और घर में आराम करना चाहिए ताकि, तुम कुछ समय ज़्यादा जीवित रह सके| दुष्यंत, डॉक्टर्स की सलाह के अनुसार, नौकरी छोड़ देता है और अपने घर में, आराम करने लगता है| दुष्यंत के बीमार होने से, उसके पिता को सबसे ज़्यादा दुख होता है| दुष्यंत ही उनके बुढ़ापे का इकलौता सहारा था लेकिन, अब उन्हें ही, अपने बेटे का सहारा बनना पड़ रहा था| उन्होंने, दुष्यंत को ठीक करने के लिए, कई डॉक्टरों का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन, दुष्यंत की बीमारी आख़िरी चरण पर पहुँच चुकी थी और अब, विज्ञान ने भी हाथ खड़े कर दिए थे| दुष्यंत पूरी तरह जीने की उम्मीद छोड़ चुका था| वह ज़्यादातर समय, अपने घर में उदास बैठा रहता| दुष्यंत के पिता ने, उसे समझाते हुए कहा, “तुम्हें कहीं बाहर घूमने जाना चाहिए| कब तक ऐसे, घर में मायूस बैठे रहोगे| थोड़ा बहुत घूमोगे तो, तुम्हारा मन बदलेगा|” दुष्यंत अपने पिता की बात मानकर, एक सुनसान पहाड़ पर जाकर, रोज़ाना बैठने लगा| एक दिन दुष्यंत, सुबह सुबह पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गया| वहाँ उसे एक बाज़, पत्थर से चोंच टकराते हुए दिखाई दिया| दुष्यंत, बाज को काफ़ी देर तक घूरता रहा| बाज़ एक एक करके, अपने पंख नोच रहा था| दुष्यंत को बाज़ की यह हरकत, काफ़ी अजीब लग रही थी| वह सोचने लगा कि, “कोई पक्षी भला, ख़ुद को कैसे नुक़सान पहुँचा सकता है|” बाज को बुरी हालत में देखकर, उसके मन में बहुत से सवाल उठ रहे थे|

तभी उसे पहाड़ी के नज़दीक, एक चरवाहा दिखाई दिया| दुष्यंत, तुरंत उस चरवाहे के पास पहुँचा और उस बाज के बारे में पूछने लगा| चरवाहा एक बुजुर्ग व्यक्ति था| उसे जंगल के कई पक्षियों का अनुभव था| उसने उत्तर देते हुए कहा कि, “तुम जिस बाज़ को देख रहे हो वह, अपने नए जीवन की तैयारी कर रहा है| दरअसल, वह अब बूढ़ा हो चुका है और उसका शरीर बीमार है जिससे, वह अपना शिकार करने योग्य नहीं है लेकिन, अपनी इच्छा शक्ति से, इतनी यातनाएं झेलने के बावजूद, वह बाज कुछ ही महीनों के अंदर, नये पंख और नई चोंच के साथ, फिर निकल पड़ेगा, अपने जीवन के सफ़र में|” चरवाहे की बात सुनकर, दुष्यंत के मन में आत्मविश्वास की किरण चमकने लगती है| वह तय करता है कि, “वह भी बाज़ की तरह, अपने जीवन की नई शुरुआत करेगा|” वह पहाड़ी के नीचे उतरकर, फिर से अपना अधूरा काम, पूरा करने निकल पड़ता है| दुष्यंत अपने पिता से कहता है कि, “मैं जब तक जीवित हूँ तब तक, एक संस्था के माध्यम से, किसानों के हित में कार्य करूँगा| बस फिर क्या था, दुष्यंत ने एक NGO के माध्यम से, अपने रुके हुए मिशन को, किसानों के हितों की रक्षा के लिए, पुनः प्रारंभ कर दिया| दुष्यंत समझ चुका था कि, “ज़िंदगी लंबी जीने से अधिक महत्वपूर्ण, सार्थक जीना होता है” और इसी के साथ यह कहानी ख़त्म हो जाती है|