कोशिश (Koshish) – Hindi Moral Story

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कोशिश (Koshish) – Hindi Moral Story in hindi

ये कहानी कुंडलपुर गाँव की है, जहाँ एक पढ़े लिखे, असफल लड़के की कोशिश ने, पूरे गाँव को ग़रीबी और भुखमरी से बाहर निकाल दिया| बात उस समय की है, जब किसानों के पास, खेती के पर्याप्त साधन नहीं थे जिसकी, कमी के कारण, गाँव में रहने वालों का जीवन, संकट में था| इसी गाँव में ही, मोहनलाल नाम का किसान रहता था| उसका कृष्णा नाम का एक बेटा जो, शहर में पढ़ाई करने गया था लेकिन, उसकी नौकरी न लगने के कारण, उसे गाँव वापस आकर, अपने पिता के साथ, मजबूरी में खेती करना पड़ रहा था| कृष्णा अपनी ज़िंदगी से ख़ुश नहीं था| उसने अपनी पढ़ाई को लेकर, बड़े बड़े सपने देखे थे लेकिन, आज वह अपनी ज़िंदगी से, हताश हो चुका था क्योंकि, बहुत कोशिश करने के बाद भी, खेती में कुछ ख़ास आमदनी नहीं हो रही थी| कृष्णा के पिता, मोहनलाल तंग होकर, अपने खेत बेचने की बात कह चुके थे| कृष्णा अपने पिताजी की हालत देखकर, अपने आप को मन ही मन कोस रहा था कि, “इतना बड़ा होने के बावजूद, वह इस लायक नहीं बन पाया कि, अपने पिता की संपत्ति, बिकने से बचा सकें|” कृष्णा एक दिन, इंटरनेट पर वीडियो देख रहा था कि, अचानक उसे एक विदेशी फल की, खेती का शॉर्ट वीडियो दिखाई देता है जिसे, देखकर उसकी आँखों में ख़ुशी की चमक आ जाती है| वह अपने पिता से जाकर बताता है कि, उसे शहर जाना पड़ेगा ताकि, कृषि अनुसंधान केंद्र से, उस ख़ास विदेशी फल के बारे में, जानकारी जुटायी जा सके| इस बार वह, अपने खेतों में, उसी विदेशी फल की खेती करना चाहता है| मोहन लाल, अपने बेटे पर बहुत भरोसा करते थे इसलिए, वह उसे शहर जाने की इजाज़त दे देते हैं क्योंकि, वह भी, अपने हालातों से वाक़िफ़ थे| उन्हें अपनी लाचारी से, उबरने का कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था| कुंडलपुर गाँव की, मिट्टी की उर्वरक क्षमता कम हो चुकी थी, इसलिए वहाँ, अनाज की खेती करना मुश्किल हो रहा था|

कोशिश (koshish)
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कृष्णा शहर पहुँचते ही, कृषि अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिकों से मुलाक़ात करता है, जहाँ उसे पता चलता है कि, वह विदेशी फल सूखी ज़मीन पर कम से कम पानी में भी उत्पादित किया जा सकता है और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में, उस फल की क़ीमतें भी, बहुत ज़्यादा है लेकिन, उसे समुद्री मार्ग से ही, मंगाया जा सकता है और उसे आयात करने की मात्रा, कम से कम 50 एकड़ ज़मीन के अनुसार ही होना चाहिए| इस बात से, कृष्णा सोच में पड़ जाता है क्योंकि, बहुत कोशिश करने के बाद भी, उसके पास सिर्फ़ पाँच एकड़ ज़मीन की व्यवस्था हो सकती थी| अब कृष्णा के सामने, बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो चुकी थी| उसके सामने दो ही रास्ते थे| या कि, ग़रीबी और भुखमरी से बचने के लिए, अपने खेत बिकने दें और या फिर, 50 एकड़ खेत का इंतज़ाम करें| कृष्णा अपने गाँव लौटते ही, गाँव के सरपंच से मिलता है, जहाँ वह उन्हें सारी बात बताता है| गाँव के सरपंच, अपने कुंडलपुर की हालात से वाक़िफ़ थे| वह गाँव के सभी किसानों को सभा के लिए बुलाते हैं| जहाँ कृष्णा उन्हें, आधुनिक युग की खेती के बारे में, सारी जानकारी देता है| इसी बीच, कुछ किसान, कृष्णा का विरोध करते हैं क्योंकि, उन्हें लगता है कि, “अभी तो उनके पास कुछ अनाज, खाने पीने के लिए उत्पादित हो जाता है लेकिन, यदि हमने विदेशी फलों की खेती की तो, हमारी हालत और भी बुरी न हो जाए|” कृष्णा उन्हें समझाने की कोशिश करते हुए कहता है कि, “आप अपने खेतों के आधे हिस्से में, फलों की खेती कीजिए और बाक़ी में, आप अपना अनाज उगाइए फिर, आप विदेशी फलों की उपज देखकर, आगे की खेती का निर्णय करिए|” कृष्णा ज़ोर देते हुए कहता है, “क्या आप सब लोग, मुझे एक मौक़ा नहीं दे सकते?” तभी गाँव के सरपंच, किसानों से अपनी ज़िम्मेदारी पर, विदेशी फल की खेती, करने का समर्थन करते हैं| सरपंच के भरोसे पर, सब किसान, कृष्णा का साथ देने के लिए, तैयार हो जाते हैं| कृष्णा सभी किसानों का समर्थन पाते ही ख़ुश हो जाता है और कुछ किसानों के साथ, शहर के लिए निकल जाता है| जहाँ सभी अपने अपने खेतों के हिसाब से, पैसे जमा करते हैं और एक आयात-निर्यात कंपनी की सहायता से, विदेशी फलों के पौधे और खाद्य सामग्री, आयात करने का ऑर्डर दे देते हैं| तयशुदा वक़्त के अनुसार, कुछ ही दिनों में, सारे पौधे कुंडलपुर गाँव आ जाते हैं|

कोशिश (farmers motivation)
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किसान पूरी मेहनत से, कृष्णा के निर्देशों के अनुसार, अपने अपने खेतों में पौधे लगाते हैं| कृष्णा बहुत मेहनती लड़का था| उसे खेती के काम से इतना प्यार होने लगा था कि, वह कई कई घंटे, बिना खाए अपने काम में लगा रहता था| कुछ ही हफ़्ते में, किसानों की मदद से, पूरे 50 एकड़ में, पौधे लगा दिए जाते हैं| गाँव के लोग, अपनी बढ़ी उम्मीदों से, खेतों की तरफ़ निहार रहे थे हालाँकि, उन्होंने खेती से फ़ायदे की इच्छा तो खो ही दी थी| उन्हें बस इंतज़ार था कि, जितना उन्होने लगाया है, कम से कम, उतना तो आना ही चाहिए, वरना इन्हें, अगले साल के लिए, अनाज की खेती की व्यवस्था करना भी, मुश्किल हो जाएगा| तीन महीने होते ही, पौधों में फूल आना शुरू हो जाते हैं जिन्हें, देखकर कृष्णा को बहुत ख़ुशी होती है| उसे लगने लगता है कि, उसकी कोशिश रंग ला रही है क्योंकि, इन फलों की यही सबसे बड़ी खासियत थी कि, छह महीने के अंदर ही, यह पेड़ अपनी सर्वोत्तम गुणवत्ता तक पहुँच जाते हैं और फल देना प्रारंभ कर देते हैं| कृष्णा ने, पहले से ही, इन विदेशी फलों की, बिक्री के लिए, कुछ कम्पनियों से, अनुबंध कर लिया था| छः महीने के होते ही, जैसे ही कुंडलपुर गाँव में, विदेशी फलों को ख़रीदने के लिए, कंपनी की गाड़ियां प्रवेश करती हैं, गाँव के लोगों में, ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ती है| गाँव के किसानों को यक़ीन ही नहीं होता क्योंकि, आज तक उन्होंने जो भी खेती की थी, इस बार उससे कई गुना ज़्यादा उनकी आमदनी हुई थी और यह तो, सिर्फ़ शुरुआत थी क्योंकि, यह पेड़ 12 साल तक, हर छह महीने में, इसी तरह फल देने वाले थे| कुंडलपुर के गांवों के किसानों की ख़ुशी का ठिकाना ही ना था| उन्होंने कृष्णा को, अपने कंधों पर उठा लिया| कृष्णा गाँव का चहेता बन चुका था| सभी उसे खेती का जादूगर कहने लगे थे| कुंडलपुर के अलावा, दूर दूर के किसान उससे जानना चाहते थे कि, उसे यह आधुनिक खेती का तरीक़ा कैसे पता चला| कृष्णा सभी से कहता है कि, “हिरण की कस्तूरी तो, उसकी नाभि में होती है लेकिन, वह उसे ढूंढने के लिए, पूरे वन में, सारी ज़िंदगी भटकता रहता है| वही हालत, हमारी होती है| दरअसल, पृथ्वी पर मौजूद भूमि कई तरह का उत्पादन कर सकती है लेकिन, शिक्षा का अभाव होने की वजह से, हम किसानों को, यह बात पता नहीं चल पाती कि, कम पानी या बंजर ज़मीन में भी, अच्छा उत्पादन किया जा सकता है| हमारे पास क़ीमती ज़मीने होती है और हम, साधारण सी खेती करके, सारा जीवन ग़रीबी में गुज़ार देते हैं लेकिन, यदि हम अपने बच्चों को, इसी तरह महँगी से महँगी चीज़ों की, खेती करना सिखाएं तो, शायद हर गाँव के हालात ही बदल जाएं| कृष्णा की बात सुनते ही, आस पास के गाँव के सभी लोग, तालियां बजाने लगते हैं और कृष्णा की बात पर अमल करने की प्रतिज्ञा लेते हैं|

 

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