आकर्षण (Aakarshan) – छोटे बच्चों की कहानी

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आकर्षण (Aakarshan) – छोटे बच्चों की कहानी in hindi

किसी भी व्यक्ति, वस्तु या स्थान के प्रति मन में उत्पन्न हुए, कोमल माधुर्य को, आकर्षण (Aakarshan) कहते हैं| ये कहानी आकर्षण के नियम पर आधारित छोटे बच्चों की कहानी है| शिवम और राजू पक्के दोस्त थे| उनकी उम्र लगभग सात, आठ साल की थी| दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे| राजू बचपन से ही मनचला लड़का था| उसके मन में, जो भी विचार उत्पन्न होते, वह उन्हीं के हिसाब से चलने लगता| अपने मनचले स्वभाव की वजह से, राजू ज़िद्दी हो चुका था| एक दिन राजू स्कूल जाते वक़्त, अपने पापा से कुछ पैसे माँगता है| उसके पापा, उससे पैसे माँगने का कारण पूछते हैं| राजू कहता है, “उसे एक मोबाइल चाहिए|” राजू के पापा, उसे इतनी कम उम्र में मोबाइल नहीं देना चाहते थे इसलिए, वह उसे मना कर देते हैं लेकिन, वह पैसों के लिए ज़िद करने लगता है| जिससे नाराज़ होकर, वह उसे डांट देते हैं| राजू पैसे न मिलने के कारण, स्कूल जाने से मना कर देता है| बहुत समझाने पर भी, जब राजू नहीं मानता तो, उसके पिता मजबूरी में उसे, मोबाइल दिलाने के लिए तैयार हो जाते हैं| इस बात से ख़ुश होकर, राजू स्कूल जाने के लिए मान जाता है| स्कूल पहुँचते ही, वह अपने दोस्त शुभम से, मोबाइल लाने की बात बताता है लेकिन, शिवम उसे समझाता है कि, “अभी हम बहुत छोटे हैं और हमें अभी इतना ज्ञान नहीं है कि, कौन सी चीज़ हमारे देखने लायक है और, कौन सी नहीं इसलिए, मोबाइल लेने का, तुम्हारा फ़ैसला ग़लत है” लेकिन, अब तो राजू ने अपने मन में ठान लिया था कि, उसे मोबाइल लेना ही है| स्कूल से लौटते ही, वह अपने पिता के साथ, बाज़ार जाकर एक बढ़िया मोबाइल ले आता है| मोबाइल के आते ही, राजू सब कुछ भूलकर, सारा दिन गेम खेलता रहता| पढ़ाई में तो, वह पहले ही मन नहीं लगा पाता था लेकिन, अब मोबाइल की वजह से, उसने स्कूल जाना ही छोड़ दिया| तीन दिन से राजू अपने घर में ही, मोबाइल पर गेम खेल रहा था| उसके पिता मोबाइल लाकर पछता रहे थे| उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि, राजू चीज़ों के प्रति इतना आकर्षित क्यों होता है|

छोटे बच्चों की कहानी
Image by giselaatje from Pixabay

वह अपने बेटे को, पढ़ाई के लिए केंद्रित देखना चाहते थे लेकिन, राजू की इन्द्रियाँ उसे हमेशा, कई दिशाओं में घुमाती रहती| एक दिन राजू अपने घर में बैठे, सुबह सुबह मोबाइल पर गेम खेल रहा था| उसी वक़्त, उसके घर शिवम पहुँचता है| वह अपने दोस्त को ऐसी हालत में देखकर, बहुत दुखी होता है| राजू अपने मोबाइल में, इतना व्यस्त हो चुका था कि, उसे शिवम के आने की कोई ख़ुशी नहीं होती| वह उस पर ध्यान दिए बिना, लगातार अपने मोबाइल में, गेम खेले ही जा रहा था| तभी शिवम, राजू के पापा के पास जाकर बैठ जाता है| शिवम को देख कर, राजू के पापा कहते हैं, “मैं बहुत परेशान हूँ| मैं अपने बेटे को एक अच्छा इंसान बनाना चाहता हूँ लेकिन, यदि यह सारा दिन, इसी तरह गेम खेलता रहेगा तो, इसके भविष्य का क्या होगा?” शिवम बहुत समझदार लड़का था| वह राजू के पिता का, ढाढस बढ़ाते हुए कहता है, “आप चिंता मत करिए| आप एक बार मेरे दादाजी से मिल लीजिए| मुझे पूरी उम्मीद है कि, उनके पास राजू की समस्या का, कोई न कोई उपाय ज़रूर होगा|” राजू के पिता की, शिवम की बात सुनकर, थोड़ी उम्मीद बढ़ती है| वह शिवम् के साथ, राजू को अकेले घर पर छोड़कर, उसके दादा से मिलने, निकल पड़ते हैं हालाँकि, राजू को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था क्योंकि, उसने मोबाइल से, दोस्ती कर ली थी और अब, वह अपने सगे संबंधियों तक को भूल चुका था| शुभम के दादा जी, एक गाँव के स्कूल में पढ़ाते हैं|

आकर्षण
Image by Jörg Peter from Pixabay

शिवम् अपने दादाजी के पास पहुंचकर, उनके पैर पड़ता है और उनके सामने, ज़मीन पर बैठ जाता है| राजू के पिता, शिवम की विनम्रता देखकर दंग रह जाते हैं| उन्हें मन ही मन एहसास हो जाता है कि, दादाजी कोई ख़ास व्यक्ति हैं| तभी शिवम उन्हें इतना सम्मान दे रहा है| वह भी, शिवम के दादा जी को हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं| तभी शिवम, दादाजी को राजू के पिता का परिचय देते हुए, उनकी समस्या दादाजी के सामने रख देता है| दादा जी, कई सालों से साहित्य का अध्ययन कर रहे थे इसलिए, उन्होंने पल भर में ही, राजू की समस्या समझ ली थी| दादाजी ने तुरंत उन्हें आश्वासन देते हुए कहा, “आपके बेटे की इस हालत की वजह तो, आप स्वयं है क्योंकि, आपने ही बचपन से, अपने बच्चे को, दुनिया की चीज़ों के प्रति आकर्षण सिखाया है| क्या अच्छा है, क्या बुरा है, ये भेद तो, आप ने सिखाया है, ना? जब आप, दुनिया की किसी भी चीज़ को बुरा कहते हैं तो, वह चीज़, दिमाग़ में, ज़्यादा आकर्षक बन जाती है| आपको यह समझना होगा कि, प्रकृति की सभी चीज़ें एक ही हैं| इनमें भेद, आपकी आंखें ही करती है| किसी भी विषय, व्यक्ति या वस्तु की एक ज़रूरत होती है और उसकी ज़रूरत के हिसाब से, आप तय करते हैं कि, उस चीज़ का महत्व कितना है| आज आपके बेटे का मोबाइल चलाना, आपको इसलिए बुरा लग रहा है क्योंकि, मोबाइल में आपने पाबंदी लगायी है| अगर बच्चे को सही मार्गदर्शन दिया जाए तो, उसी मोबाइल के द्वारा, वह सर्वश्रेष्ठ शिक्षा ग्रहण कर सकता है लेकिन, जब आपको स्वयं ही मोबाइल के सदुपयोग के बारे में, नहीं पता तो, भला आप अपने बेटे को, चीज़ों के अच्छा-बुरा होने का ज्ञान, कैसे दे सकते हैं? दरअसल आपने ही, आज तक मोबाइल में, किसी तरह की अच्छी चीज़ नहीं देखी इसलिए, आप अपने बच्चे को, मोबाइल का सही इस्तेमाल करना, नहीं सिखा पा रहे| अन्यथा यह कोई बड़ी समस्या नहीं| यह तो वरदान है कि, आपका बेटा, अपनी भटकती हुई इन्द्रियों को, एक मोबाइल में सीमित कर रहा है| अब आपकी ज़िम्मेदारी है कि, उसे मोबाइल की असली ताक़त दिखाए और उस तक, सही ज्ञान पहुँचने दें|” राजू की पिता को, अपनी गलती का एहसास होता है| उन्हें पहली बार, कमी अपने बेटे में नहीं, बल्कि अपने आप में, नज़र आ रही थी| वह समझ चुके थे कि, सबसे पहले उन्हें, क्या बदलना होगा, तभी राजू की ज़िंदगी बदलेगी| उन्हें उनकी समस्या का समाधान मिल चुका था और अब, उन्होंने तय कर लिया था कि, अपने ज्ञान का दिया जलाकर, राजू के जीवन को सही दिशा देंगे|

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