प्रतिभा (Pratibha) – Youth story

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प्रतिभा (Pratibha) – Youth story in hindi

ये कहानी वीरनगर गाँव की है| यहाँ के लोग महान प्रतिभाओं के धनी हुआ करते थे| वीरनगर गाँव का हर बच्चा, शारीरिक मज़बूती का अद्भुत उदाहरण था| सामान्य बच्चो की तुलना में, इस गाँव के बच्चे कई गुना प्रतिभाशाली थे लेकिन, कई बरसों से इस गाँव के बच्चों की हालत ख़राब हो चुकी थी| मानो इनके गौरवपूर्ण इतिहास को, किसी की नज़र लग गयी हो जो, बच्चे पहले दौड़ने, कूदने, उछलने, चढ़ने और तैरने में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभावान थे, वही आज सामान्य बच्चों के स्तर से गिर चुके थे और वह दूसरे गांवों की तुलना में कमज़ोर होते जा रहे थे| ज़्यादातर बच्चों ने, गंदी आदतों में प्रवेश कर लिया था| देखते ही देखते कई साल गुज़र चुके थे, लेकिन इस गाँव के एक भी बच्चे ने, किसी भी प्रतियोगिता में विजेता का स्थान हासिल नहीं किया था| एक दिन एक व्यक्ति के वीरनगर में दाख़िल होते ही, गाँव के सभी लोग आश्चर्य चकित हो जाते हैं क्योंकि, इस व्यक्ति की पोशाक, वीरनगर के पुरखों से मिल रही थी और उनके चेहरे में वैसा ही तेज़ दिखाई दे रहा था जैसा कि, इस गाँव के इतिहास की मिट्टी में पाया जाता था|

प्रतिभा
Image by Gioele Fazzeri from Pixabay

गाँव के कुछ वृद्ध व्यक्ति इनके सामने आकर खड़े हो जाते हैं और इनसे पूछते हैं, “आप कहाँ से आए हैं|” इस व्यक्ति ने जवाब देते हुए कहा कि, “मैं बहुत दूर से आया हूँ लेकिन, आपके गाँव की हालत देखकर बहुत मुझे बहुत दुख हो रहा है| मुझे इस गाँव का इतिहास पता है लेकिन, कई बरसों से इस गाँव के बच्चों की प्रतिभा समाप्त हो चुकी है| क्या आप लोगों में से कोई इसका कारण बता सकता है?” तभी उन बुजुर्ग व्यक्तियों ने कहा कि, “हे सज्जन पुरुष इसका उत्तर, आपको हमारे आचार्य ही दे सकते हैं क्योंकि, बच्चों की शिक्षा दीक्षा की ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है और वही हमारे गाँव के बच्चों को कला और कौशल की प्रेरणा देते हैं|” तभी यह व्यक्ति गाँव के आचार्य जी की ओर अपना रुख़ मोड़ लेते हैं और आचार्य जी के पास पहुँचते ही, उनके सामने हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं| आचार्य जी इन्हें हैरानी से देखते हुए पूछते हैं कि, “आप कौन हैं और मेरे पास आने की वजह?” तभी गाँव के कुछ लोग आचार्य जी से कहते हैं कि, “यह हमारे गाँव के बाहर आते हुए दिखाई दिए| इनकी बातें सुनकर हमें लगा कि, आप ही इनके प्रश्नों का उत्तर दे सकते हैं| ये जानना चाहते हैं कि, आप इस गाँव के बच्चों को कैसे शिक्षा देते हैं?” आचार्य जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि, मैंने अपने गाँव के बच्चों को हमारे इतिहास की गौरवपूर्ण कहानियां सुनाई है, जिसमें मैंने बच्चों को बताया है कि हमारे पुरखे हवाओं का रुख़ मोड़ देते थे| आसमान की ऊंचाइयों तक उनकी पहुँच थी| समुद्र के गहरे से गहरे स्तर तक जाने की उनकी अद्भुत क्षमता अकल्पनीय थी|” आचार्य जी की बात सुनते ही, सज्जन व्यक्ति उन्हें रोक देते हैं और कहते हैं कि, “आपको अपने पूर्वजों का इतिहास इसी तरह से पता है, क्या? आपके पूर्वजों में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी, क्या? और आसमान तक जाना क्या होता है| उसकी कोई उच्चतम सीमा तो होगी ना?” आचार्य जी ने कहा, “मैं आपकी बात समझ पाने में असमर्थ हूँ| कृपया स्पष्ट रूप से समझाएँ|” तभी वह व्यक्ति मुस्कुराते हुए, नदी की ओर चलने लगता है| सभी उसके पीछे पीछे आने लगते हैं, अचानक वह व्यक्ति नदी में छलांग लगा देता है और बहुत तेज गति से तैरते हुए, नदी पार कर जाता है और उतनी ही तेज़ी से तैरते हुए वापस आ जाता है| यह देखकर गाँव के लोगों की आंखें फटी रह जाती है|

Pratibha (Hindi moral story)
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उन्हें यक़ीन ही नहीं होता कि, इतनी उम्र का व्यक्ति और इतनी भयंकर तैराकी| लोग कुछ कह पाते कि, अगले ही पल वह व्यक्ति एक बड़े से पेड़ में बंदर से भी तेज गति से चढ़ जाता है| लोग यह देखकर ताज्जुब में पड़ गए थे| इस बुजुर्ग व्यक्ति की शारीरिक क्षमता, किसी जवान लड़के से कई गुना थी| उन्होंने अपना शारीरिक कौशल दिखाते हुए, अपनी प्रतिभा से सबका दिल जीत लिया था| गाँव के आचार्य समझ नहीं पा रहे थे कि, इतनी प्रतिभा, जो कभी वीरनगर गाँव का इतिहास हुआ करती थी, वह इस बुजुर्ग के पास कैसे है? आचार्य तुरंत बुजुर्ग के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं और कहते हैं कि, “मैं कुछ नहीं समझ पा रहा हूँ| कृपया मुझे बताएँ, आप कौन हैं और इस गाँव में ही क्यों आए हैं?” तभी उस बुजुर्ग व्यक्ति ने, अपने गले में लटका हुआ एक लॉकेट दिखाया और कहा, “यह मेरे पूर्वजों की निशानी है| क्या आप लोग इसे पहचानते हो?” लॉकेट को देखते ही, गाँव के कुछ लोग कहने लगे कि, “यह तो हमारे गाँव के प्राचीन मंदिर का निशान हैं जो, हमारे पूर्वजों ने बनाया था लेकिन, यह आपके पास कैसे आया?” तभी उस बुजुर्ग व्यक्ति ने अपनी कहानी सुनाते हुए कहा कि, “मैं भी इसी गाँव का लड़का था लेकिन बचपन में मेरे पिताजी इस गाँव से दूर चले गए| हम कई सालों तक एक जंगल में गुज़ारा करते रहे| वहीं मैंने अपनी शारीरिक क्षमता बढ़ायी, जिसकी वजह से इतना प्रतिभावान बना| मेरे पिताजी ने मेरे पूर्वजों का गौरवशाली इतिहास, महिमा मंडित करके नहीं बताया बल्कि, यथार्थ रूप से साधारण इंसान की तरह कमजोरियां भी बतायी, जिससे मैंने अपने आप को कभी हीन भावना से नहीं देखा| मैंने अपने पूर्वजों को अवतार नहीं समझा बल्कि, उन्हें देखकर मुझे प्रेरणा मिली और मुझमें भी उन्हीं की तरह बनने का साहस उत्पन्न हुआ लेकिन, आप लोगों ने अपने बच्चों को इतिहास बताने में गलती कर दी| आप लोगों ने अपने बच्चों के सामने महान लोगों की एक भी कमियाँ नहीं बतायी| इन्सान तो गलतियो का पुतला होता है| हर इंसान में कई तरह की बुराइयाँ होती है जो कि, उसे उसके जन्म से ही मिलती है और उन्हीं कमियों को हटाना ही, एक श्रेष्ठ गुण होता है, जिसे हम साधना कहते हैं लेकिन, आप लोगों ने पूर्वजों की कमियां छुपाकर और उनकी बहादुरी को अकल्पनीय कार्य से जोड़कर, भ्रम फैलाया है, जिसकी वजह से आपकी पूरी पीढ़ी, अपने गौरवशाली इतिहास को भूल चुकी है| यदि आप आज अपने बच्चों को सभी विषयों में पारंगत देखना चाहते हैं तो, आपको यथार्थ बताना ही होगा, जिससे इस गाँव के बच्चे फिर से प्रतिभावान बन सकें|” बुजुर्ग व्यक्ति की बात सुनकर, गाँव के सभी लोग तालियां बजाने लगते हैं और गाँव के आचार्य हाथ जोड़कर क्षमा माँगते हुए कहते हैं कि, “मैं ही इन बच्चों का दोषी हूँ जिसने, अपने बच्चों को वास्तविक इतिहास से वंचित रखा| मुझे माफ़ कर दीजिए| मेरा आग्रह है कि, आप ही इस गाँव के आचार्य बने हैं ताकि, उन्हें सही मार्गदर्शन मिल सके|” इतना कहते ही वह उनके सामने हाथ जोड़कर बैठ जाते हैं और इसी के साथ वीर नगर गाँव को अपना इतिहास पुरुष मिल जाता है|

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