मेरी दुनिया (Meri Duniya)- सबसे अच्छी कहानी

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मेरी दुनिया (Meri Duniya)- सबसे अच्छी कहानी (Moral Stories):

यहाँ हर किसी की अपनी दुनिया है| जो जिस तरह का है, वह उसी हिसाब से, अपनी दुनिया बनाता है| मेरी दुनिया, एक ऐसे लड़के की सबसे अच्छी कहानी है जो, अपने जीवन से निराश हो चुका था और उसकी जीने इच्छा ख़त्म हो चुकी थी| ये कहानी शिवराम की है| जो सामान्य परिवार का लड़का है| शिवराम के पिता, सब्ज़ी का फुटकर व्यापार करते थे| जिससे उनके परिवार का जीवन यापन होता था| शिवराम बारहवीं की परीक्षा पास कर चुका था| उसके पास आगे पढ़ाई करने का विकल्प नहीं था| उसकी मजबूरी थी कि, उसे अब कोई न कोई काम करना था जिससे, उसका भविष्य अच्छा हो सके| शिवराम के चाचा, सब्ज़ी मंडी में ठेकेदार थे| उन्होंने शिवराम के सामने, सब्ज़ी मंडी के हिसाब किताब का काम करने का प्रस्ताव रखा| लेकिन, शिवराम ज़िंदगी में कुछ ऐसा करना चाहता था कि, “उसे अपने काम से परेशानी न हो| उसे अपना काम बोझ न लगे|” उसने सब्ज़ी मंडी में लोगों को परेशान हालत में देखा था| इसलिए उसे मंडी में काम करने का बिलकुल मन नहीं था लेकिन, शिवराम के पिता उसे समझाते हैं, “जब तक तुम्हें, तुम्हारे मन का कोई काम नहीं मिलता, तब तक तुम, सब्ज़ी मंडी में ही काम करो क्योंकि, घर बैठे रहोगे तो, तुम्हारा ख़र्चा हम कैसे उठाएंगे|” शिवराम मजबूर हो चुका था| वह अपने चाचा के साथ, सब्ज़ी मंडी का हिसाब किताब करने का मन बना लेता है और अगले ही दिन, वह मंडी पहुँच जाता है| यहाँ पहुँचते ही, शिवराम का दिमाग़ घूमने लगता है| चारों तरफ़, गाड़ियों की आवाजें और चिल्ला रहे लोग, उसके कान में गोलियों की तरह लग रहे थे| शिवराम, अपने कान में हाथ रखकर, किनारे बैठ जाता है| अचानक, शिवराम के चाचा, उसे देख लेते हैं और उसे आवाज़ लगाते हैं| शिवराम ने अपने कानों को बंद कर रखा था इसलिए, वह अपने चाचा की आवाज़ नहीं सुन पा रहा था| शिवराम के चाचा, उसके पास जाकर, उसे अपने साथ आने को कहते हैं| शिवराम अपने मन को शांत करने की कोशिश करता है| शिवराम के चाचा उससे कहते हैं, “तुम्हें शुरू में थोड़ा परेशानी होगी, बाद में तुम्हें इसकी आदत हो जाएगी| लेकिन, शिवराम ऐसी ज़िंदगी को, अपनी आदत नहीं बनाना चाहता था| शिवराम फँस चुका था|

मेरी दुनिया (Meri Duniya)
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उसे यहाँ कुछ दिन तो गुज़ारने ही पड़ते इसलिए, वह मंडी का लेखा जोखा करने के लिए, कुर्सी में बैठ जाता है और धीरे धीरे काम करना शुरू कर देता है| शिवराम का जीवन, प्रतिदिन बद से बदतर होता जा रहा था| कुछ महीने गुज़रते ही, वह धीरे धीरे मंडी के काम में ढलने लगता है| ऐसा लग रहा था कि, जैसे शिवराम को शोरगुल वाली ज़िंदगी से, अब कोई परेशानी नहीं हो रही थी लेकिन, यह भ्रम टूट गया| जब एक दिन, मंडी में भीड़ अधिक होने के कारण, शिवराम का काम बढ़ गया जिससे, वह हताश हो जाता है और अपनी कुर्सी छोड़कर, मंडी के बाहर आ जाता है| वह बाहर टहल ही रहा था कि, अचानक उसकी नज़र एक बुजुर्ग व्यक्ति पर पड़ती है| वह उसे देखकर मुस्कुरा रहे थे| शिवराम उनके पास पहुँचता है और उनके मुस्कुराने की वजह पूछता है| वह व्यक्ति किसान था| बुजुर्ग किसान कहता है कि, “तुम इतनी जल्दी अपनी ज़िंदगी से हार रहे हो इसलिए, मुझे तुम्हारी नादानी देखकर हँसी आ रही है|” शिवराम को ताज्जुब होता है कि, “वह तो बाहर टहलने आया था लेकिन, यह किसान उसके अंदर की बात कैसे समझ गया|” वह किसान से तुरंत पूछता है, “आपको कैसे पता कि, मैं अपनी ज़िंदगी से हताश हूँ| किसान ने हँसते हुए कहा, “मैंने इस मंडी में कई साल गुज़ारे हैं लेकिन, आज तक कभी परेशान नहीं हुआ क्योंकि, उसकी सबसे बड़ी वजह है, मेरी दुनिया जोकि, मैंने ख़ुद बनायी है| दरअसल, किसी भी इंसान को, अपने सामने की वस्तु, वैसे ही दिखाई देते है, जैसा वह अंदर से होता है| उदाहरण के तौर पर, व्यापारी सब्ज़ी को, उसकी माँग के अनुसार देखेंगे और ग्राहक, अपने स्वाद के अनुसार लेकिन, एक गाय, सब्ज़ी को अपनी भूख अनुसार देखेगी| सब्ज़ी तो एक ही है लेकिन, उसको देखने वालों की नज़र, उस सब्ज़ी को अलग बनाती जा रही है इसलिए, तुम्हारी परिस्थितियां आज तुम्हें, जहाँ रखे हुए हैं, उसकी ज़िम्मेदार, तुम्हारी नज़र और तुम्हारा नज़रिया, दोनों ही हैं| यदि तुम अपने जीवन को बदलना चाहते हो तो, “तुम्हें अपने सारे डर ख़त्म करने होंगे और डर ख़त्म करने के लिए, तुम्हें अपना स्वार्थ हटाते हुए, काम चुनना होगा क्योंकि, जिस काम में तुम अपना फ़ायदा सोचोगे, वहाँ डर का होना स्वाभाविक है| लालची व्यक्ति, सबसे ज़्यादा डरपोक होता है| यदि तुम, अपने काम के प्रति ईमानदार हो तो, तुम निर्भय होते हुए, जीवन का असली आनंद ले पाओगे क्योंकि, डर हमें कभी खुलकर, नहीं जीने देगा इसलिए, सबसे पहले, अपने सोचने का नजरिया बदलो|

सबसे अच्छी कहानी
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इतनी सारी बातें सुनने के बाद भी, शिवराम को कुछ भी समझ नहीं आता| वह जिज्ञासा करते हुए, किसान से पूछता है कि, “आप मंडी में इतने सालों से काम करने के बाद, ख़ुश कैसे रहे? उसका कारण बताइए|” तभी किसान ने कहा, “मैंने खेती करने को, पैसे कमाने का ज़रिया नहीं बल्कि, अपना धर्म माना और जब, आपका कर्म ही, आपका धर्म बन जाए तो, हताशा और निराशा के लिए, आपके जीवन में, कोई जगह नहीं बचती लेकिन, अपना कर्म चुनने से पहले, तुम्हें ख़ुद को पहचानना होगा क्योंकि, तुम्हारी दुनिया तुम्हें उसी तरह दिखेगी, जिस तरह तुम होगे और यदि तुम, ख़ुद को बिना पहचानें, अपने निर्णय लोगे तो, हमेशा परेशान रहोगे| शिवराम कहता है, “मुझे बताइए, मैं ख़ुद को कैसे पहचान सकता हूँ|” किसान खड़े होकर, जाने लगता है और पलटकर कहता है, “जैसे सब्ज़ी मंडी से बाहर आए थे| वैसे ही, दुनिया से भी बाहर आ जाओ| दुनिया के लोगों ने, तुम्हें जो भी बनाया है या, दुनिया के सामने तुम जो भी बन कर बैठे हो, अपनी मानसिक स्थिति को, उससे बाहर ले आओ| तो तुम्हें, तुम्हारा असली चेहरा दिखना शुरू हो जाएगा और इतना कहते हैं ही, किसान वहाँ से चला जाता है| शिवराम निकल पड़ता है| ख़ुद की तलाश में|

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